घण्डियाल डांडा में स्थित है भगवान घण्टाकर्ण का मन्दिर इन्हें भगवान श्री बद्री विशाल के द्वारपाल के साथ-साथ क्षेत्रपाल का स्थान भी प्राप्त है।

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एस.के.सती
घण्डियाल डांडा क्वीली नरेन्द्रनगर, टिहरी गढवाल में घण्डियाल देवता का पौराणिक मन्दिर है। घण्डियाल देवता हिन्दू एवं जैन धर्मावलम्बियों के द्वारा पूजित प्रमुख देवता हैं। यह घण्टाकर्ण मन्दिर उत्तराखण्ड का सबसे प्रमुख पौराणिक मन्दिर है, जिसका वर्णन केदार खण्ड के अध्याय 148 में भी वर्णित है। यह मन्दिर पर्यटन की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है, यह उत्तराखण्ड का एक मात्र ऐसा स्थान है जिससे हरिद्वार और हिमालय के दर्शन एक साथ किये जा सकते हैं। साथ ही इसके पूर्व में माँ चन्द्रबदनी मन्दिर, उत्तर में माँ सुरकण्डा मन्दिर, पश्चिम में माँ कुंजापुरी का मन्दिर एवं तलहटी में कोटेश्वर महादेव मन्दिर व कोटेश्वर बाँध स्थित हैं। यहाँ से रात्रि में मसूरी, देहरादून व हरिद्वार के रोशनी में जगमग विहंगम दृश्य दिखाई देते हैं।
स्कन्द उवाच
त्तो वै पश्चिम भागे घण्टाकर्ण इति स्मृतः।
भैरवों भीषणकारः सर्वसत्त्वभयंकारः।।१।।
तस्य पूजनमात्रेण सर्वसम्पन्मयो भवेत्।।२।।
पूर्वभागेऽपि तस्यापि पर्वताधो व्यवस्थिता।
नाम्ना कन्दुमती ख्याता सर्वपापप्रणाशिनी।।३।।
राँका च महाभागा शिला ब्राह्मी परा मता।
तस्या दर्शनमात्रेण ब्रह्मलोके महीयते।।४।।
ततो वे पश्चिमे याभ्येे नदी मोक्षवती परा।
गंगायां संगमे यत्र मोक्षतीर्थ तु तत्स्मृतम्।।५।।
तत्र स्नानात्रते याति परब्रह्माणि लीनताम्।
तत्र मोक्षेश्वरं लिंगं भक्तमोक्षप्रदायकम्।।६।।
तस्य दर्शनमात्रेण नरो ब्रह्मात्वमाप्नुयात्।।७।।

धार्मिक मान्यताओं में भगवान शंकर का स्थान तीनों आदिदेवों संग है। भगवान शंकर पुरानी संस्कृतियों में देवताओं और दैत्यों दोनों के पूज्य रहे हैं और उनका आशीर्वाद सभी को समान रूप से मिलता रहा है। भगवान राम (विष्णु अवतार) और रावण दोनों ही शंकर भगवान के उपासक थे और युद्ध से पहले दोनों ही उनकी पूजा अर्चना करते है। फिर महाभारत काल में श्री कृष्ण भगवान के रूप में अवतार लेकर विष्णु भगवान ने उस समय काल की दिशा और दशा निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाभारत काल और उसके लम्बे समय बाद तक देवताओं का हस्तिनापुर (दिल्ली) के कई मन्दिरों में वास रहा है। किन्तु समयान्तर में देवताओं ने अन्य पवित्र स्थानों पर जाने की आवश्यकता समझी और हिमालय की तरफ प्रस्थान किया। क्योंकि इस से ज्यादा सुरम्य और रमणीय जगह उन्हें कहीं और नहीं मिली। शायद इसी वजह से इस क्षेत्र को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान घण्टाकर्ण भी हरिद्वार, ऋषिकेश होते हुए ढाईगला पंहुचे और यह मान्यता है कि उन्होनें वृद्ध का रूप धारण कर यह रास्ता तय किया था। फिर एक वृद्ध के रूप में बैठ कर वहाँ पर उन्हांेने कई लोगों से साथ ले जाने की प्रार्थना की थी, लेकिन कोई भी राजी नहीं हुआ। उसी समय भगत सजवाण अपने साथियों के साथ वहाँ से सामान लेकर जा रहे थे यहाँ से दो दन्त कथायें प्रचलित हैं। –

  1. घण्टाकर्ण भगवान ने वृद्ध रूप में भगत सजवाण से साथ ले जाने को कहते हैं। भगत सजवाण की कई पीड़ियों पूर्व के लोग इस इलाके में महाराष्ट्र से आकर रह रहे थे और उनका खेती-बाड़ी और पशुपालन का व्यवसाय था, लेकिन तेल गुड़, घी इत्यादि के लिए वे ऋषिकेश आते थे और आवश्यक वस्तुऐं लेकर वापस आ जाते थे। उस दिन भगत सजवाण भी काफी बोझ तले पहाड़ की ऊंचाई नाप रहे थे और अपने साथियों से कुछ पीछे छूट गए थे। भगत सजवाण ने उन वृद्ध व्यक्ति को अपने कंधे में रखे सामान के ऊपर बैठने को कहा। इसके बाद अपने घर को चलने लगा। रास्ते में पर्वत की चोटी पर वह विश्राम के लिए रूके। जब भगत सजवाण फिर से चलने के लिए तैयार हुए तो देखा कि वहाँ वह वृद्ध व्यक्ति नहीं हैं। यहाँ-वहाँ कई जगह ढूंढा परन्तु उन वृद्ध व्यक्ति का कोई पता नहीं चला। भगत सजवाण परेशान हालत में घर पहुँचा। उसे उन वृद्ध व्यक्ति के ओझल हो जाने की घटना दुःखी भी कर रही थी और चमत्कारी भी लग रही थी। रा़ित्र में स्वप्न में उनको एक दिव्य पुरूष ने आकर बताया कि तुमने मेरी रास्ते में मदद् की थी। जब भगत सजवाण ने उनसे पूछा की वे कौन हैं तो उन्होनें बताया कि वह घण्टाकर्ण देवता हैं और जहाँ से ओझल हुए थे वहाँ पर लिंग रूप में स्थापित हैं। जब भगत सजवाण अन्य गाँव वालों के साथ वहाँ गये तो उन्हें लिंग रूप में भगवान के दर्शन हुए। अब यहाँ पूजा अर्चना की जाने लगी। इस पर्वत का नाम घण्डियाल डांडा रखा गया और फिर एक मंडल बना कर उनके एवं आसपास के गाँव के लोगों ने पूजा अर्चना शुरू कर दी। अब यहाँ भव्य मन्दिर स्थापित है और दूर-दूर से दर्शनार्थी यहाँ भगवान के दर्शन हेतु आते हैं। बिजल्वाण पंडित पहले से ही सजवाणों के कुल गुरू और सरोले थे और हर बात में उनके साथ विचार विमर्श किया जाता रहा था तो मन्दिर कि व्यवस्था उनको सौंप दी गयी जो की आज तक चल रही है।
  2. भगवान घण्डाकर्ण ने बाल रूप धारण कर भगत सजवाण से साथ ले जाने को कहा। भगत सजवाण काफी बोझ तले पहाड़ की ऊंचाई नाप रहे थे और अपने साथियों से कुछ पीछे छूट गए थे। उनका कोई बच्चा भी नहीं था और पत्नी इसी वजह से दुःखी और चिड़चिड़ी रहती थी। बच्चे का निवेदन भगत के दिल को छू गया और उन्होंनें बच्चे को अपने सामान के ऊपर बैठने को कहा। फिर तो जैसे उनमें नई उमंग आ गई और एक नवीन ऊर्जा का उनमें संचार हो गया। भगत सजवाण ने बच्चे को अपने सामान के ऊपर बिठाया और आगे बढे़। अन्य साथियों को पीछे छोड़ कर सबसे पहले घर पहुंच गए। सारा सामान संभालने के बाद उनको बच्चे का ध्यान आया लेकिन बच्चा ओझल हो गया। काफी दूर तक ढूँढने गये परन्तु बच्चे का कहीं पता नहीं चला। जब उन्होनें सारी कहानी अपनी पत्नी को बताई तो उसको विश्वास नहीं हुआ और इस सबको उसने उनकी बढ़ती उम्र का एवं थकान का असर कह कर टाल दिया। रा़ित्र में स्वप्न में उनको एक दिव्य पुरूष ने आकर बताया कि तुमने मेरी रास्ते में मदद की थी। जब भगत सजवाण ने उनसे पूछा की वे कौन है तो उन्होनें बताया कि वह घण्टाकर्ण देवता हैं और वह तुम्हारी दया और भक्ति से प्रसन्न होकर मदद करना चाहते हैं। वह जो भी मांगे दे सकते हैं। सजवाण ने सृख समृद्धि की कामना की और थोड़ी देर में वह दिव्य पुरूष अंर्तध्यान हो गए। उसके बाद भगत सजवाण के घर में बरकत लौट आयी और उनके घर में बेटा एवं बेटी के पदार्पण में ज्यादा समय नहीं लगा तथा घर में काफी धन सम्पति आने लगी।
    एक दिन उसी रास्ते पर जाते हुए उनको ध्यान आया कि घण्टाकर्ण देवता की वजह से ही उनका उद्धार हुआ है। इसलिए उनको देवता का मन्दिर बनवाना चाहिए। भगत सजवाण ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि घर लौट कर सभी भाई-बंधुओं एवं कुल पुरोहित के साथ मंत्रणा कर इस पावन काम पर लग जाना है। लोगों की सलाह से पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर मन्दिर का पत्थर रखा गया। अब यहाँ पूजा अर्चना की जाने लगी। इस पर्वत का नाम घण्डियाल (घण्टाकर्ण) डांडा रखा गया और फिर एक मंडल बना कर उनके एवं आसपास के गाँव के लोगों ने पूजा अर्चना शुरू कर दी।
    कालांतर में यहाँ से ही घण्टाकर्ण देवता का एक पत्थर का दुकड़ा लोस्तू बड़ियारगढ़ पंहुचा और वहाँ पर भी कुछ विस्मयकारी चमत्कारों के बाद घण्डियाल के नाम से प्रसिद्ध मंदिर का मंडल बना, जो अब एक बहुत ही सुंदर और भव्य मंदिर में तब्दील हो गया है और पूरे इलाके के लोगों की आस्था एवं श्रद्धा का प्रतीक है।
    घण्डाकर्ण फिर कई स्थानों में पूजे जाने लगे और उनको भगवान श्री बद्री विशाल के द्वारपाल के साथ-साथ क्षेत्रपाल का स्थान भी प्राप्त हुआ। आज भी श्री बद्रीनाथ मन्दिर परिसर में घण्टाकर्ण देवता का मन्दिर परिक्रमा में आता है और सभी तीर्थयात्री वहाँ पर आशीर्वाद लेते हैं। अभी उत्तराखण्ड के अलावा नेपाल, गुजरात, असम, महाराष्ट्र आदि अनेक स्थानों पर भी श्री घण्टाकर्ण देवता की पूजा अर्चना होती है और जैन धर्म के लोगों को भी उन पर असीम आस्था है।

घण्टाकर्ण धाम पहुँचने का मार्गः- ऋषिकेश से खाड़ी गजा मार्ग से गोताचली तक मोटर मार्ग तथा यहाँ से 3.5 किमी0 पैदल मार्ग यात्रा एवं आवास व्यवस्था 10 कमरे की धर्मशाला व बिस्तर आदि उपलब्ध।
-विनोद बिजल्वाण, जखोली(क्वीली), मो0-9458970042।
-विजय बिजल्वाण- मो0-9411113781
अध्यक्ष- श्री घण्टाकर्ण मन्दिर व्यवस्था एवं विकास समिति।
बमण गाँव (क्वीली), टिहरी गढ़वाल।

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